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मुझे अकेले पन में साथी
याद तुम्हारी कैसे आती
आँसू रहकर इन आँखों में अपना कैसे नीड़ बनाते?
यदि तुम मुझसे दूर न जाते!

तुम हो सूरज-चाँद ज़मीं पर
किसका क्या अधिकार किसी पर
मेरा मन रखने की ख़ातिर तुम जग को कैसे ठुकराते?
यदि तुम मुझसे दूर न जाते!

आँख आज भी इतनी नम है
जैसे अभी-अभी का गम है
ताज़ा-सा यह घाव न होता, मित्र तुम्हें हम गीत सुनाते!
यदि तुम मुझसे दूर न जाते!

पल-भर तुमने प्यार किया है
यही बहुत उपकार किया है
इस दौलत के आगे साथी किस दौलत को गले लगाते?
यदि तुम मुझसे दूर न जाते!

तुम आओ तो सेज सजाऊँ
तेरे संग भैरवी गाऊँ
यह मिलने की चाह न होती तो मरघट का साथ निभाते!
यदि तुम मुझसे दूर न जाते!
सारा बदन अजीब-सी ख़ुशबू से भर गया,
शायद तेरा ख़याल हदों से गुज़र गया।

किसका ये रंग-रूप झलकता है जिस्म से,
ये कौन है जो मेरी रगों में बिखर गया।

हम लोग मिल रहे हैं अना अपनी छोड़ कर,
अब सोचना ही क्या के मेरा मैं किधर गया।

लहजे के इस ख़ुलुस को हम छोड़ते कहाँ,
अच्छा हुआ ये ख़ुद ही लहू में उतर गया।

मंज़िल मुझे मिली तो सबब साफ़-साफ़ है,
आईना सामने था मेरे मैं जिधर गया।
वही आँगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,
मैं जब भी तन्हा होता हूँ, मुझे घर याद आता है।

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गाँव में, तू अक्सर याद आता है।

जो अपने पास हो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती,
हमारे भाई को ही लो, बिछड़ कर याद आता है।

सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत के' कुछ सोचें,
मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है।

मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,
नवम्बर याद आता है, दिसम्बर याद आता है।
मिलने नहीं वो आए, कई रोज़ हो गए!
उनसे नज़र मिलाए, कई रोज़ हो गए!

कैसे बताएँ उनको परेशान कितना हूँ,
होंठों को मुस्कुराए, कई रोज़ हो गए!

जब से किया पसंद उन्हें, क्या बताएँ हम,
मुझको न कोई भाए, कई रोज़ हो गए!

रातों को करवटें मैं बदलता ही रहता हूँ,
आँखों से नींद जाए, कई रोज़ हो गए!

होते थे सामने तो बहक जाते थे क़दम,
अब वो नशा भी छाए, कई रोज़ हो गए!

जाने कि प्यार करता हूँ मैं उनसे या नही,
ख़ुद को भी आज़माए, कई रोज़ हो गए!

अपनी ग़ज़ल को आप ही मैं भूलता रहा,
उसको भी गुनगुनाए, कई रोज़ हो गए!
याद करते हो मुझे

याद करते हो मुझे क्या दिन निकल जाने के बाद
इक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बाद

मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यों देखता हूँ आसमान
यह ख़याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद

एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम
भेद यह मुझ पर खुला रस्ता बदल जाने के बाद

दोस्तों के साथ चलने में भी हैं खतरे हज़ार
भूल जाता हूँ हमेशा मैं सँभल जाने के बाद

फासला भी कुछ ज़रूरी है चिरागां करते वक्त
तजुर्बा यह हाथ आया हाथ जल जाने के बाद

वहशते-दिल को बियाबाँ से है इक निस्बत अजीब
कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बाद

आग ही ने हम पे नाज़िल कर दिया कैसा अजाब
कोई भी हैरां नहीं मंज़र बदल जाने के बाद

अब हवा ने हुक्म जारी कर दिया बादल के नाम
खूब बरसेगी घटाएँ शहर जल जाने के बाद

तोड़ दो 'suraj' कमाँ या तुम कलम कर लो ये हाथ
लौटकर आते नहीं हैं तीर चल जाने के बाद।

My Own Feelings

To Love or Hate




I loved you:
So, you hated me,
Yes I’m sure you hated me.
At that turning in the foyer,
When you missed saying ‘hi’.
To the many calls
To which you never replied.
From every vibe you passed,
From all experiences past.
I knew it, I was sure,
You hated me.
I hated you for hating me ...
I loved you all the same.

So at one such turning in the foyer,
I asked you if you did,
Hands shivered nervously
You replied casually ‘I didn’t ...’
... Relieved pause ...
I was free to love you again.
आइना भी देखने को दिल नहीं करता
अब किसी से रूठने को दिल नहीं करता

आज वो तैयार हैं सब कुछ लुटाने को
पर उन्हें यों लूटने को दिल नहीं करता

यों तो सच कहने की आदत है नहीं
झूठ उनसे बोलने को दिल नहीं करता

बेखुदी में खो गया हूँ इस कदर कुछ मैं
अब खुदी को ढूँढ़ने को दिल नहीं करता

ले चलो कश्ती भँवर में 'suraj' तुम अपनी,
यों किनारे डूबने को दिल नहीं करता